Friday, November 27, 2020

दिल भरी मैंना

 

दिल भरी मैंना

तोता कह रहा अपनी मैंना से

पहली सी ह्दयी नहीं रही तुम

चंचल अलबेली कौमुदी सी

सुंदरता की मूर्त नहीं रही तुम

मैंना बोली अपने तोते से

तुम्हारा स्वभाव बदल गया है

निष्ठुर अक्खडपन भाव से

अब तुम्हारा मन भ्रम गया है

तुम बहुत बहकती रहती हो

नीरस निरा सिर दर्द हो

ओठों पर कटु भाष रहता है

रोज उपवास का बहाना रहता है

तुम्हारे गीत भाव लुप्त हो गए हैं

मुस्कराते कपाल कंही खो गए हैं

कंही नजरो मे जरूर दोष छुपा है

जग जाहिर है कंही पाप रोपा है

तुम एक ही बात कहती रहना

यूं ही आरोप  लगाती रहना

वाणी तुम्हारी अब नम नहीं

जीवन में कोइ आनंद ही नहीं

सहस्र बच्चे जवां हो उडे हमारे

आज विचार क्यो बदले तुम्हारे

मनचली कहते नहीे थकते थे

पल पल प्रेम की आहें भरते थे

तुम्हारी बातें  समझ नही आती

वो दिल को कभी छू नही पाती

मैं कहीं चलता हूं दूसरी डाल पर

जहर उगल रही अपनी जुबां पर

जाओ प्रेमी, जंहा तुम्हें जाना है

मैं तुमसे भी अधिक उन्मूक्त हूं

नव पुत्रयौवन को राह दिखाना है

मैं प्रकृति संग ही अभिभूत हूं

तोते ने आज नइ उडान भरी

बेवफा बन नए मित्र की तलाश करी

नव प्रेमिका को पाने की जंग लडी

युवा तोते से घायल हो,टूटी पंखुडी

टूटी पंखुडी, बेजान हुआ तोता

सहस्र बच्चों की मां को कैसे बुलाता

तरू पर ऐसी अजनबी हलचल हुइ

मैंना को प्रेमी पीडा की अनुभूति हुइ

मैंना ने जान की बाजी लगादी

पिया धर्म की नाव पार लगादी

फिर से प्रेम का अभिषेक हुआ

तोते को अपने अहं का एहसास हुआ



तोते ने सिर कदमो में रख दिया

धन्य हो खग देवी मुझे बचा लिया

मैं अभागा तोता तुम्हें जान ना पाया

ह्दयी प्रेम सींचन को भांप ना पाया

नव मिलन से आभाषी बन कर

परिवार के सब तोते वंहा आए

मां बाप का प्रेम प्रवाह देखकर

सबने तरू पत्ते जोर जोर से हिलाए


Tuesday, November 17, 2020

मकडी

                                          मकडी

मकडी  छोटा सा कीट

शरीर, सूखा सा कंक्रीट

श्रम का अदभूत पुजारी

कीट वर्ग पहचान न्यारी

सचेत सबल सुयोजनकारी

जाल बुने विघटनकारी

समय स्थान का चुनाव

बुद्धि कौशल कला भाव

चक्रव्युह रचना ऐसे करती

शिक्षित सी वह जान पडती

जाल का ताना बाना ऐसा

दुश्मन का अकाल सहसा

लार से धागा जाल बुनती

तकनीक का विस्तार करती

सुयोजन की देती  सीख

मानव  श्रम करता  दिख

संहारक पर हमला करती

पादप जंतु की रक्षा करती

धागे का इतिहास सुनाती

व्यस्त जीवन योग बनाती

ईश्वर अल्हा से दूर दूर

प्रकृति मे मन बसा उसका

लक्ष्य पर सजग बहादूर

मनुज समझे स्वभाव उसका


इम्तिहान

 


इम्तिहान

दीवार मे कंही एक छोटा झरोखा

कबूतरो का मित्र  युग्ल अनोखा

कबूतर पंखुडी पूंछ शनै शनै हिलाता

गुटरगूं कर प्रेम का इजहार जताता

मादा कबूतर दिखाती अजनबी खेल

मस्त रगं से ना उपजा कोइ सुमेल

नेत्र बंद कर लिए मस्ती उसकी देख

गुटरगूं पर प्रेम भाव नहीं उगा संरेख

अगले दिन  कबूतर ने नीति बदली

घास तिनको से घोसले की नींव रखी

मेहनत से दिखा जीवन दर्शन का भाव

मादा का दिखाइ दिया बदलता स्वभाव

कबूतर फिर पंखुडी पूंछ को हिलाता

गुटरगूं कर  नया गीत घर का गाता

विश्वास का भाव जगाता प्रेम दिखाया

गर्दन झुकाती मादा  नयन भर आया

प्रेम भाव को मादा ने कैसे परखा

कर्मठता को भी प्रेम तराजू मे रखा

प्रेम आंनद नहीं सृजन रूप कहलाता

सहवास वास से नया संसार बसाता

इम्तिहान से  गुजरा नर मेहमान

साहस कर्मठता का लिया संज्ञान

मानव भी खग जग से कुछ सीखे

प्रेमसरिता बहे चंहु ओर सुख दिखे

Tuesday, November 3, 2020

बादल

                         बादल

काले बादल गहरे बादल

जल से लदे बादल

धरा की प्यास बुझाते बादल

सूरज की तपस को मिटाते बादल

हवा से खेलते बादल

सिंधू भू का योग बनाते बादल

किसान को प्यारे बादल

जीवन को गति देते बादल

रिक्त स्थान को भरते से

अंबर के उपवन मे सजे से

छटा बिखेरते,रूप बदलते से

सर्व जीवन को मोह लेते से

सूर्य का सामना करने वाले

शीत चन्द्र का समर्थन पाले

मारूति का संग भरने वाले

पादप तरू को सहलाने वाले

काली घन घोरघटा कहलाते

डर का भाव सहज दिखाते

तडित का आलय बन जाते

बच्चों को अक्सर खूब डराते

नदी नालो के जीवन साथी

पर्वत घाटी ताल सबके साथी

गडगडहाट कर बने महारथी

जंगल मे चिगांडे जैसे  हाथी

बादल है जल है

जल ही जीवन है

जीवन है धरा उज्जवल है

धरा हमारी, ग्रह विशेष है




Sunday, November 1, 2020

बरसात

                                         बरसात

बरसात  का आगमन

प्रकृति करे स्वागतम

नम हवाओं के झोंके

धरा आंचल को समेटे

बादल चाल आती जाती

तपस को दूर भगाती

हरियाली और खुशहाली

महक उठा घास जंगली

तिनको को मिला सहारा

हरित से ढका तन हारा

कृषक गडरिया खुश भारा

पशु को मिला भरपूर चारा

नदी नाले सबल बने

जल जीवन को गति मिले

पोंखरो मे जल भराव

जलसंचय से सुचित्त गांव

कृषक को मिला वरदान

एक नइ फसल की आशा

महक उठे खेत खलिहान

जन जन की मिटे निराशा

बारसात से राज काज संभले

सर्व जीव जगत अंदाज बदले

संवृद्धि,गति का अदभूत सार

समृद्धि पौषक  प्रकृति साभार


Saturday, October 31, 2020

साहसी जीवन

           साहसी जीवन







ज्वार के पौधों के बीच विचरती

भोजन को ढूंढती एक काबरी

एकाग्रता से लक्ष्य को तलाशती

शत्रु से अनजान हुइ  खगचरी

                                       दबे पांव शत्रु आगे बढ रहा

                                       नेवले सा शैतान लग रहा

                                       झट से उस पर हमला कर दिया

                                       खगचरी को कसकर पकड लिया

संकट की घडी दम घूटने लगा

फडफडाहाट से पंख गिरने लगा

उर्जा संचयी बन छूटने का प्रयास हुआ

ज्वार काटते किसान की हुर हुर से

नेवले का लक्ष्य निष्फल हुआ

                                                                    घायल होकर खगचरी उड चली

                                                                     हैरान हुआ मैं, देख उसका साहस

                                                                     फिर से  पौधों के बीच आ बैठी

                                                                     मौत की जंग को समझा एक उपहास

पल पल खतरा,किसे आभास है

संघर्ष मे ही जीवन का साथ है

साहस जंहा शीर्ष पर है

वंहा जीवन निबार्ध गतिमान है


  

Sunday, October 25, 2020

संतुलन

      संतुलन

गंधे नाले कीचड से सने

परजीवी का  घर बने

वृक्षों के सूखते तने

खग जग का कैसे सहारा बने

                                                                        हमारे कृत्यो पर अति का भार                                  नित्य हो रहे संहार

                                                                         परतंत्र हो रही नदियां

                                                                         टूटते पहाड,मिटती घाटियां


अभ्यारण बनता निर्जीव

विलुप्त हो रहा जीव

विषाक्त हो चला सागर

प्रदूषित हवा बनी दुश्वार

                                                                      हमारे असंतुलित विकास पर

                                                                      व्यथित प्रकृति हंसती है

                                                                      व्याधियों का देकर उपहार

                                                                      स्वयं को संतुलित कर लेती है


दिल भरी मैंना

  दिल भरी मैंना तोता कह रहा अपनी मैंना से पहली सी ह्दयी नहीं रही तुम चंचल अलबेली कौमुदी सी ...