संतुलन
गंधे नाले कीचड से सने
परजीवी का घर बने
वृक्षों के सूखते तने
खग जग का कैसे सहारा बने
हमारे कृत्यो पर अति का भार नित्य हो रहे संहार
परतंत्र हो रही नदियां
टूटते पहाड,मिटती घाटियां
अभ्यारण बनता निर्जीव
विलुप्त हो रहा जीव
विषाक्त हो चला सागर
प्रदूषित हवा बनी दुश्वार
हमारे असंतुलित विकास पर
व्यथित प्रकृति हंसती है
व्याधियों का देकर उपहार
स्वयं को संतुलित कर लेती है
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