जीवन चक्र
टप टप बूंदे बरसी
भू ह्रदय मे आ बसी
ह्रदय से अंकूर फूटा
हरित फिर से लौटा
मेघा आए नीचे नीचे
देखो,हरियाल को सींचे
दौड पडा पशुओं का समूह
हरित पर रखा अपना मुंह
फिर मानष की सेवा करता
कभी कभार बोझा ढोता
दूध दही का सागर भरता
पनीर का स्वाद चखाता
अपने तन से काटा टुकडा
मनुज का भरता मुखडा
दिवाकर से नाता जोडकर
मेघा फिर से चले आऐगें
नभ से राह बनाकर
बूंदों से मिट्टी को भिगोने आऐगें
लो,आज फिर बूंदो का वक्त हुआ
जीवना का चक्र पूरा हुआ

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