Friday, October 16, 2020

ज्ञानी हत्यारा

 

ज्ञानी हत्यारा

बरगद का  पुराना दरखत

घनी सी छाया वाला

जोहड को करता शुशोभित

बडी बडी शाखाओं वाला

        शाखाएं इतनी मोटी मोटी

        पैदल चलने  के गलियारे हो

        दाढों की संख्या कौटि कौटि

        जैसे सब वृक्षों का दादा हो

पक्षियों का अदभूत सिंहासन

खोखरों मे उल्लू का निवासन

चमगादडो का स्थायी प्रवास

बरबंटी खाते तोते खास खास

        छोटे बच्चे इस दरखत से डरते

        बडों के साथ,इसे देखने भी आते

        विस्मय से वे कदापि हंस नहीं पाते

        किशोर डंडाबिलंगनी का मजा लेते

ज्ञानी ने उसके पास बनाया ठहराव

ज्ञान से ओतप्रोत हुआ सारा गांव

खग कोलाहल से था ज्ञानी परेशान

शाखाओं को कटवाने का हुआ फरमान

        आबाद कोलाहलित शहर उजडने लगा

        अनहोनी समझ वंहा से उडने लगा

        फिर भी ज्ञानी का सांस घूट रहा था

        जड से कटवाने का विचार बन रहा था

सैंकडों बैल गाडियों पर बरगद लद गया

ज्ञानी को पैसा,शकून दोनो मिल गया

आबाद चमन उसके हाथों उजड गया

चिडियाघर बच्चों का, अलविदा हो गया

        ज्ञानी अपना अंधकार दूर नहीं कर सका

        उठा अपने बर्तन  ,दूसरी जगह सरका

        धर्मबीर,कब समझेगें लोग इस प्रकति को

        पल्लिवत गोद आकार देती जो सबको


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