Saturday, October 31, 2020

साहसी जीवन

           साहसी जीवन







ज्वार के पौधों के बीच विचरती

भोजन को ढूंढती एक काबरी

एकाग्रता से लक्ष्य को तलाशती

शत्रु से अनजान हुइ  खगचरी

                                       दबे पांव शत्रु आगे बढ रहा

                                       नेवले सा शैतान लग रहा

                                       झट से उस पर हमला कर दिया

                                       खगचरी को कसकर पकड लिया

संकट की घडी दम घूटने लगा

फडफडाहाट से पंख गिरने लगा

उर्जा संचयी बन छूटने का प्रयास हुआ

ज्वार काटते किसान की हुर हुर से

नेवले का लक्ष्य निष्फल हुआ

                                                                    घायल होकर खगचरी उड चली

                                                                     हैरान हुआ मैं, देख उसका साहस

                                                                     फिर से  पौधों के बीच आ बैठी

                                                                     मौत की जंग को समझा एक उपहास

पल पल खतरा,किसे आभास है

संघर्ष मे ही जीवन का साथ है

साहस जंहा शीर्ष पर है

वंहा जीवन निबार्ध गतिमान है


  

Sunday, October 25, 2020

संतुलन

      संतुलन

गंधे नाले कीचड से सने

परजीवी का  घर बने

वृक्षों के सूखते तने

खग जग का कैसे सहारा बने

                                                                        हमारे कृत्यो पर अति का भार                                  नित्य हो रहे संहार

                                                                         परतंत्र हो रही नदियां

                                                                         टूटते पहाड,मिटती घाटियां


अभ्यारण बनता निर्जीव

विलुप्त हो रहा जीव

विषाक्त हो चला सागर

प्रदूषित हवा बनी दुश्वार

                                                                      हमारे असंतुलित विकास पर

                                                                      व्यथित प्रकृति हंसती है

                                                                      व्याधियों का देकर उपहार

                                                                      स्वयं को संतुलित कर लेती है


Tuesday, October 20, 2020

छलित गोद

 छलित गोद

प्रकृति की गोद,व्यापक सार

जीवन पोषक,संपदा अपार

मनुज कर्म छलित व्यवहार

असहज जीवन निरर्थक आधार

कदम कदम पर

विभिन्नताएं पादप दल की

विस्मय दूनिया जंतु दल की

विलुप्त होने के कगार पर है

नदी झरने पहाड अदभूत है

राह सबके बाधित है

जंहा जंहा  तेरी नजर है

वंहा सर्व जीवन कुंठित है

सबका श्वसन अब घुट रहा है

कर्म तेरा दंभ से सज रहा है

इसी भ्रम से सिर उंचा रखना

मृत्यु का सामान तैयार रखना


Saturday, October 17, 2020

केदारनाथ त्रासदी

 

केदारनाथ त्रासदी

प्रकृति का अनुपम उपहार

केदारनाथ की पर्वतमाला

ऐतिहासिक शिवा मन्दिर

अध्यात्मवाद का उजाला

उंचे उचें पर्वत शिखरों से

खुशी मिले अपरम पार

टेढे मेढे संकरी  राहो से

हृदय में भय  का संचार

केदारनाथ धाम की उंचाई

घाटियों की उमडती तन्हाई

मेघा बरसे, ले गर्जन भाव

सरिता में उफना जल भराव

आसमां में बादल फटा कैसा

हर यात्री भय से सन्न,सहसा

प्रलयकारी जल का बहाव बना

जीवजंतु , दरिया का ग्रास बना


जन  मानस हुआ परेशान

पशु पक्षी  सब  हुए बेजान

लुढकते पत्थर ,गिरते पहाड

उजड  रहा  जैसे  ब्रह्मांड

पल  भर का  महाप्रलय

संतप्त  हुआ   निर्भालय

बिखरे पडे  नर  कंकाल

पशु पक्षी,सब मरे अकाल

महेश दत्ता का सारा परिवार

निमंत्रित थे  कई रिस्तेदार

केदारनाथ धाम की यात्रा पर

प्रलय से उजडा उनका संसार

अनहोनी का गुनाहगार कौन

मां बाप संतप्त,मौन ही मौन

चमन से खिले फूल टूटे ऐसे

प्रकृति कहर से रूठे भी कैसे

मंथन में डूबा गया  संसार

प्रकृति पर क्यों इतना भार

स्वच्छंदता  पर हुआ प्रहार

काल रूप,क्षमता से लाचार


Friday, October 16, 2020

ज्ञानी हत्यारा

 

ज्ञानी हत्यारा

बरगद का  पुराना दरखत

घनी सी छाया वाला

जोहड को करता शुशोभित

बडी बडी शाखाओं वाला

        शाखाएं इतनी मोटी मोटी

        पैदल चलने  के गलियारे हो

        दाढों की संख्या कौटि कौटि

        जैसे सब वृक्षों का दादा हो

पक्षियों का अदभूत सिंहासन

खोखरों मे उल्लू का निवासन

चमगादडो का स्थायी प्रवास

बरबंटी खाते तोते खास खास

        छोटे बच्चे इस दरखत से डरते

        बडों के साथ,इसे देखने भी आते

        विस्मय से वे कदापि हंस नहीं पाते

        किशोर डंडाबिलंगनी का मजा लेते

ज्ञानी ने उसके पास बनाया ठहराव

ज्ञान से ओतप्रोत हुआ सारा गांव

खग कोलाहल से था ज्ञानी परेशान

शाखाओं को कटवाने का हुआ फरमान

        आबाद कोलाहलित शहर उजडने लगा

        अनहोनी समझ वंहा से उडने लगा

        फिर भी ज्ञानी का सांस घूट रहा था

        जड से कटवाने का विचार बन रहा था

सैंकडों बैल गाडियों पर बरगद लद गया

ज्ञानी को पैसा,शकून दोनो मिल गया

आबाद चमन उसके हाथों उजड गया

चिडियाघर बच्चों का, अलविदा हो गया

        ज्ञानी अपना अंधकार दूर नहीं कर सका

        उठा अपने बर्तन  ,दूसरी जगह सरका

        धर्मबीर,कब समझेगें लोग इस प्रकति को

        पल्लिवत गोद आकार देती जो सबको


Thursday, October 15, 2020

हिमालय का दर्द

 हिमालय का दर्द

बांध  सामान अपना अपना

चार दोस्तो की एक मंडली

मन मे छुपाए पहाड सा सपना

ट्रेन से हिमालय को निकली

यमुनोत्री गंगोत्री की बात करते रहे

धौलाधार श्रृखंला मन मे भरते रहे

सफेद चादर जैसे उंचे उंचे पहाड

जैसे मन से करे कोइ खिलवाड

कल कल करते बहते झरने

गहरे पाताल की ओर जाती खांइया

वलयकार संकरे राह,नदियों के मुहाने

चेहरे पर पड जाती कभी कभी छांइया

तीनों दोस्त झूम झूम बडे मुस्कराए

प्रकृति की छटा मन मे जरा बसाए

उपर नीचे भिन्न भिन्न कोणों को

कैमरे मे कैद किया जींवत तस्वीरों को

चौथे मित्र की निराशा से वे चौंक गए

उसके लिए तरह तरह के भोज लाए

मित्र,यंहा आनंद उठाने के लिए आए है

दर्द मिटाना है छुपाने नहीं आए है

अजनबी मित्र उन्हें चोटी पर ले गया

वंहा से गुजरते बडे बडे वाहनों को दिखाया

रेत बजरी से भरे,हर रोज गुजरते हैं

तुम्हारे कामदेव की नींव को खोदते हैं

वंहा देखोए पहाड पर मशीने खडी हैं

हिमालय को चीर देने पर अडी खडी है

झरनों को देखो,जंहा पानी ही नहीं रहा

कटते पेडों से,प्रकृति का वैभव खो रहा

मित्रो,हमारी पवित्र धरा का तिलक सा

हिमालय कब तक जमा रहेगा

हमारी निज स्वार्थ पूर्ति करता सा

भारत मुकुट बन,कब तक सजा रहेगा


जंहा प्रकृति को छेडा जाऐगा

जख्मों को जंहा कुरेदा जाएगा

वंहा गहरे तुफान बनकर बादल उठेगें

मनुष्य की गर्दन पकड उसे दबोचेगें

सुनकर,चारो मित्र अब हंस नहीं सके

सच्चाइ पर पर्दा  वे ढक नहीं सके

भविष्य अंधकारमय उन्हें अनुभव हुआ

ऐसा सोच,हृदय उनका प्रकाशमय हुआ


Wednesday, October 14, 2020

संताप

 

          संताप

खेत खलिहानों मे लगी दोपहर को आग

काली चिडिया का दिन हुआ आज नर्भाग

गमी के मोड पर छोटी छोटी खुष्क झाडियां

घोंसलो मे पल रही उनकी नन्ही सी दुनिया

आग की लपटें आती देख शोर होने लगा

बेबस लाचार थक पेड पर झुंड लौटने लगा

अपनी ही आंखों से उजडता संसार देखा

गोद हुइ कुंद, सुना सा आसमां सा देखा

आग बुझ गइ वे वापिस  लौटने लगी

नइ आशा से इधर उधर झांकने लगी

अपने सपनों के संसार को नहीं ढूंढ सकी

भोली, आग के स्वभाव को नहीं जान सकी

शिखर पर बैठ उनके भाव जाग उठे

किसान हर रोज रोटी जो खिलाता था

वह दयालु प्रभु , हमसे क्यों रूठे

नन्हीं दुनिया को देखने क्यों आता था

अगले दिन बुजुर्ग किसान ने मंजर देखा

संताप से उसकी आंखों मे पश्चाताप देखा

चिडियां ने मचा शोर,अपना दुख सुनाया

उसके फैंके टुकडों को धीरे धीरे उठाया

बुजुर्ग कंही से नइ झाडी काट कर लाया

गढा खोद गाढा उसे,नया ब्रहमाडं बनाया

चिडियां ने उसके पश्चाताप को खूब समझा

फिर बना घोसलें, लहराइ नइ ध्वजा


Tuesday, October 13, 2020

जांबाज गौरेया

       जांबाज गौरेया





खजूर का पेड,अदभूत  छतरी जैसा

गौरेयां का समुह नइ बस्ती जैसा

पत्तों से धागे चटक चटक कर वे लाती

बडी तकनीकी से महल वे अपना बनाती

गौंरेयां ने घोसलों मे अंडे दे रखे थे

घोसलों से बच्चों की चहचहाट आ रही थी

बाहर बैठी गौरेया कुछ,मानो पहरे दे रखे थे

अनुशासन प्रिय गौरेया,विशेज्ञ लग रही थी

एक दिन वंहा काली नागिन  आ गइ

हुंकार उसकी सुनकर,गौरेयां सजग बन गइ

शोर कर वंहा मौजूद किसान को जगाया

भागी नागिन,आज तो खतरा टल गया

दिन का उजाला था, खतरा टल गया

रात का पहरा कैसा, यह विचार बन गया

आधी रात, नागिन शिखर पर चढ गइ

अंडे,बच्चे, कुछ गौरेयां को निगल गइ

सुरक्षित बची गौरेयां,मंथन में जुट गइ

बैठ समुह में,भविष्य की शुद् में खो गइ

कंहा रह गइ कमियां,ऐसा सोचने लगी

वृद्ध जांबाज , उपदेश उनको देने लगी

गौरेया कृष्ण सा अर्जुन को उपदेश देती रही

कृषकों को उल्हाने दे देकर तंज कसती रही

खलिहानों मे दाने छोडने वाला कृषक कहां गया

खेत खलिहान आग में स्वाहा करता चला गया

किसान का बडा दिल तो देखो

अंधड,ओले और भूकंप से कांप उठता है

हमारा मस्तिष्क चीर के तो देखो

चील,बाज,नागिन,हर पल खतरा मंडराता है

मनुज पेडों को अंधाधूधं काट रहा है

दाने दाने को अपना समझ रहा है

माया की छाया में हमे भूल रहा है

हम नहीं बची,स्व कब्र वो खोद रहा है

पहले कितना अच्छा जमाना था

किसान थोडा सा भी अभिमानी न था

दो दो मास तक खेत खाली रहते थे

भेड बकरी मवेशी  चरते रहते थे

हम जग की जांबाज गौरेया  हैं

हवा मे उडकर बाते करने वाली

वीर गौरेयां, हम बडी अदभूत है

अपने वंश को आगे बढाने वाली

नए सवेरे का आगाज होने वाला है

नइ किरण नइ आशा,आगे हाथ बढाना है

हमें हार का नहीं जीत का जश्न मनाना है

आदमी की तरह फंदा नहीं उठाना है

हम अपने घोषलें ऐसे पेड पर बनाऐगें

जंहा जालिम नागिन जैसा खतरा न हो

हम  गौरेयां  सीना तानकर जियेगें

दुश्मन हमारे आज अंहकार में न हो

रात भर गौरेयां का प्रवचन चलता रहा

बहनों,आदमी अब हमारा साथी नहीं रहा

प्रकृति को नत होकर हमें चलना है

फिर से एक नया संसार बसाना है

धर्मबीर,गौरेयां तुम सच्चे दिल वाली हो

तुम सचमूच जांबाज कहलाने लायक हो

मैंनें तुम्हारे दर्द को पहचान लिया है

शब्दों मे भाव सृजन सबको परोस दिया है

पहाड जैसे दुख पर वो हंस नहीं सकी

प्रवचन सुनकर वे उडने  को तैयार हो सकी

सुबह की किरणे जैसे ही धरती पर पडी

दिशा ज्ञान जान,गौरेयां ने नइ उडान भरी


Monday, October 12, 2020

जीवन चक्र

                   जीवन चक्र




टप टप  बूंदे बरसी

भू ह्रदय मे आ बसी

ह्रदय से अंकूर  फूटा

हरित फिर से लौटा

मेघा आए नीचे नीचे

देखो,हरियाल को सींचे

दौड पडा पशुओं का समूह

हरित पर रखा अपना मुंह

फिर मानष की सेवा करता

कभी कभार बोझा ढोता

दूध दही का सागर भरता

पनीर का स्वाद चखाता

अपने तन से काटा टुकडा

मनुज का भरता मुखडा

दिवाकर से नाता जोडकर

मेघा फिर से चले आऐगें

नभ से राह बनाकर

बूंदों से मिट्टी को भिगोने आऐगें

लो,आज फिर बूंदो का वक्त हुआ

जीवना का चक्र पूरा हुआ


Sunday, October 11, 2020

बूंद

                       बूंद


मंद मंद हवा का शोर

झर झर पडी बूंदे

धरती  हो उठी भाव विभौर

फैली चहुं ओर मुकंद

भू माटी ने किया स्वागत

धरा मुस्कराहट ले आइ

बीज हुआ नमी से अवगत

अंकूर उठा,हरित बन आइ

बादलों की गडगडहाट से

आलिगंन मे डूबा जंगल

बूंदो की आहट से

सर्व जीवन हुआ मंगल

कोलाहल में डूबा खग विहार

भोजन के खुले,उनके द्वार

नइ उडान भरने को तैयार

बूंदो से हुआ जीवन का संचार


सावन

                       सावन               


रिमझिम बरसात से

हरे भरे पत्ते खिल उठे

ठंडक पाकर सावन से

मेंढक सब जाग उठे

खेतो मे फैली हरियाली

सावन का रंग दिखाइ दे

किसानो की खुशहाली

हर चेहरे पर दिखाइ दे

सूखी जमीन पर अकूंर फूटा

रेगिस्तान मे हरियाल लौटा

धरा पर खिल उठी कली कली

देखो,जीवन को गति कैसे मिली

        मस्त बच्चे  बाहर निकले

सावन का मजा उठाने को

छप छप करते रहे,मनचले

गली मे शोर मचाने को

वृद्धजन रखें पांव संभल सभंल के

कंही गिर ना जाएं पांव फिसलके

बादलों को देखे आंख फाड फाड के

रास्ते क्यों रोक लिए आज उनके

हवा सावन की,घूमड घूमड आइ

सखियां सारी ले अगंडाइ

दीवाने करे शब्दो की हेरा फेरी

तन्हाइ पर रचे  वे शायरी

वीरान छतो पर चढ गए मयूर

पंख फैला नाचे प्रेम मे अति चूर

गर्दन नीचे कर  सोचे मयूरी

प्रेम का भाव समझना जरूरी

        प्रकृति कर रही आज स्नान

        जीवों का होता सा पूरा अरमान

विषाक्त हवा ताजगी से भरी

        भू लोक बना सावन का आभारी


दिल भरी मैंना

  दिल भरी मैंना तोता कह रहा अपनी मैंना से पहली सी ह्दयी नहीं रही तुम चंचल अलबेली कौमुदी सी ...