हिमालय का दर्द
बांध सामान अपना अपना
चार दोस्तो की एक मंडली
मन मे छुपाए पहाड सा सपना
ट्रेन से हिमालय को निकली
यमुनोत्री गंगोत्री की बात करते रहे
धौलाधार श्रृखंला मन मे भरते रहे
सफेद चादर जैसे उंचे उंचे पहाड
जैसे मन से करे कोइ खिलवाड
कल कल करते बहते झरने
गहरे पाताल की ओर जाती खांइया
वलयकार संकरे राह,नदियों के मुहाने
चेहरे पर पड जाती कभी कभी छांइया
तीनों दोस्त झूम झूम बडे मुस्कराए
प्रकृति की छटा मन मे जरा बसाए
उपर नीचे भिन्न भिन्न कोणों को
कैमरे मे कैद किया जींवत तस्वीरों को
चौथे मित्र की निराशा से वे चौंक गए
उसके लिए तरह तरह के भोज लाए
मित्र,यंहा आनंद उठाने के लिए आए है
दर्द मिटाना है छुपाने नहीं आए है
अजनबी मित्र उन्हें चोटी पर ले गया
वंहा से गुजरते बडे बडे वाहनों को दिखाया
रेत बजरी से भरे,हर रोज गुजरते हैं
तुम्हारे कामदेव की नींव को खोदते हैं
वंहा देखोए पहाड पर मशीने खडी हैं
हिमालय को चीर देने पर अडी खडी है
झरनों को देखो,जंहा पानी ही नहीं रहा
कटते पेडों से,प्रकृति का वैभव खो रहा
मित्रो,हमारी पवित्र धरा का तिलक सा
हिमालय कब तक जमा रहेगा
हमारी निज स्वार्थ पूर्ति करता सा
भारत मुकुट बन,कब तक सजा रहेगा
जंहा प्रकृति को छेडा जाऐगा
जख्मों को जंहा कुरेदा जाएगा
वंहा गहरे तुफान बनकर बादल उठेगें
मनुष्य की गर्दन पकड उसे दबोचेगें
सुनकर,चारो मित्र अब हंस नहीं सके
सच्चाइ पर पर्दा वे ढक नहीं सके
भविष्य अंधकारमय उन्हें अनुभव हुआ
ऐसा सोच,हृदय उनका प्रकाशमय हुआ
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