Wednesday, October 14, 2020

संताप

 

          संताप

खेत खलिहानों मे लगी दोपहर को आग

काली चिडिया का दिन हुआ आज नर्भाग

गमी के मोड पर छोटी छोटी खुष्क झाडियां

घोंसलो मे पल रही उनकी नन्ही सी दुनिया

आग की लपटें आती देख शोर होने लगा

बेबस लाचार थक पेड पर झुंड लौटने लगा

अपनी ही आंखों से उजडता संसार देखा

गोद हुइ कुंद, सुना सा आसमां सा देखा

आग बुझ गइ वे वापिस  लौटने लगी

नइ आशा से इधर उधर झांकने लगी

अपने सपनों के संसार को नहीं ढूंढ सकी

भोली, आग के स्वभाव को नहीं जान सकी

शिखर पर बैठ उनके भाव जाग उठे

किसान हर रोज रोटी जो खिलाता था

वह दयालु प्रभु , हमसे क्यों रूठे

नन्हीं दुनिया को देखने क्यों आता था

अगले दिन बुजुर्ग किसान ने मंजर देखा

संताप से उसकी आंखों मे पश्चाताप देखा

चिडियां ने मचा शोर,अपना दुख सुनाया

उसके फैंके टुकडों को धीरे धीरे उठाया

बुजुर्ग कंही से नइ झाडी काट कर लाया

गढा खोद गाढा उसे,नया ब्रहमाडं बनाया

चिडियां ने उसके पश्चाताप को खूब समझा

फिर बना घोसलें, लहराइ नइ ध्वजा


No comments:

Post a Comment

दिल भरी मैंना

  दिल भरी मैंना तोता कह रहा अपनी मैंना से पहली सी ह्दयी नहीं रही तुम चंचल अलबेली कौमुदी सी ...