संताप
खेत खलिहानों मे लगी दोपहर को आग
काली चिडिया का दिन हुआ आज नर्भाग
गमी के मोड पर छोटी छोटी खुष्क झाडियां
घोंसलो मे पल रही उनकी नन्ही सी दुनिया
आग की लपटें आती देख शोर होने लगा
बेबस लाचार थक पेड पर झुंड लौटने लगा
अपनी ही आंखों से उजडता संसार देखा
गोद हुइ कुंद, सुना सा आसमां सा देखा
आग बुझ गइ वे वापिस लौटने लगी
नइ आशा से इधर उधर झांकने लगी
अपने सपनों के संसार को नहीं ढूंढ सकी
भोली, आग के स्वभाव को नहीं जान सकी
शिखर पर बैठ उनके भाव जाग उठे
किसान हर रोज रोटी जो खिलाता था
वह दयालु प्रभु , हमसे क्यों रूठे
नन्हीं दुनिया को देखने क्यों आता था
अगले दिन बुजुर्ग किसान ने मंजर देखा
संताप से उसकी आंखों मे पश्चाताप देखा
चिडियां ने मचा शोर,अपना दुख सुनाया
उसके फैंके टुकडों को धीरे धीरे उठाया
बुजुर्ग कंही से नइ झाडी काट कर लाया
गढा खोद गाढा उसे,नया ब्रहमाडं बनाया
चिडियां ने उसके पश्चाताप को खूब समझा
फिर बना घोसलें, लहराइ नइ ध्वजा
No comments:
Post a Comment